रचना संख्या: 01
रेशमी लिबास और संस्कारों की नीलामी
श्रेणी: सामाजिक विसंगति | स्थान: सिटी जंक्शन
प्लेटफार्म नंबर 4 पर 'सिटी एक्सप्रेस' की प्रतीक्षा थी। उमस भरी दोपहर में भीड़ बेहाल थी, तभी सबकी नजरें एक रसूखदार परिवार पर टिकीं। सात साल का नन्हा 'आर्यवीर' (काल्पनिक नाम) अपनी मखमली फ्रॉक जैसी चमकती शर्ट में इधर-उधर दौड़ रहा था। वह बार-बार अपनी ही धुन में फर्श पर थूक रहा था। उसके पिता अपनी महंगी घड़ी में समय देख रहे थे, पर बेटे की इस हरकत पर पूरी तरह मौन थे।
वहां खड़े वर्दीधारी और बाबू लोग भी खामोश थे। शायद थूक की गंदगी से ज्यादा डर उन्हें उस परिवार के 'रुतबे' से लग रहा था। अगर यही हरकत किसी फटेहाल बच्चे ने की होती, तो अब तक कानून और संस्कार दोनों जाग चुके होते।
वहां खड़े वर्दीधारी और बाबू लोग भी खामोश थे। शायद थूक की गंदगी से ज्यादा डर उन्हें उस परिवार के 'रुतबे' से लग रहा था। अगर यही हरकत किसी फटेहाल बच्चे ने की होती, तो अब तक कानून और संस्कार दोनों जाग चुके होते।
मर्म (The Brain Attack):
उस दिन समझ आया कि गंदगी केवल फर्श पर नहीं, समाज की 'चुनिंदा नैतिकता' में भी है। अमीर का 'नटखटपन' और गरीब की 'बदतमीजी' के बीच की यह दूरी ही हमारे समाज का असली चेहरा है।
उस दिन समझ आया कि गंदगी केवल फर्श पर नहीं, समाज की 'चुनिंदा नैतिकता' में भी है। अमीर का 'नटखटपन' और गरीब की 'बदतमीजी' के बीच की यह दूरी ही हमारे समाज का असली चेहरा है।
— सत्यप्रिय महतो की डायरी से
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